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mahabharat 3.213.35: किसी वस्तु का स्वामित्व न रखना, सभी परिस्थितियों में पूर्णतया संतुष्ट रहना तथा समस्त कामनाओं और लोभ का त्याग कर देना - यही परम ज्ञान है और यही सच्चा एवं पूर्ण आत्मज्ञान है ॥35॥   |   mahabharat अध्याय 3.213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.213.35 
आकिञ्चन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम्।
एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
किसी वस्तु का स्वामित्व न रखना, सभी परिस्थितियों में पूर्णतया संतुष्ट रहना तथा समस्त कामनाओं और लोभ का त्याग कर देना - यही परम ज्ञान है और यही सच्चा एवं पूर्ण आत्मज्ञान है ॥35॥
 
Not to possess anything, to remain completely satisfied under all circumstances and to give up all desires and greed - this is the ultimate knowledge and this is the true and perfect self-knowledge. ॥35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)