श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.213.29 
नित्यं क्रोधात् तपो रक्षेद् धर्मं रक्षेच्च मत्सरात्।
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादत:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
क्रोध से तप की, द्वेष से धर्म की, मान-अपमान से ज्ञान की तथा प्रमाद से अपने आप की सदैव रक्षा करनी चाहिए ॥29॥
 
One should always protect penance from anger, religion from hatred, knowledge from respect and insult and oneself from carelessness. 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)