श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.213.28 
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रह:।
एतत् पवित्रं लोकानां तपो वै संक्रमो मत:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
लोभ और क्रोध की प्रवृत्तियों का हर प्रकार से दमन करना चाहिए। यही संसार का सबसे पवित्र तप है और यही सबको भवसागर से पार ले जाने वाला सेतु माना गया है॥28॥
 
The tendencies of greed and anger should be suppressed by all means. This is the purest penance in the world and it is considered to be the bridge that takes everyone across the ocean of existence.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)