श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.213.24 
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते॥ २४॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य अपने मन की शुद्धि से अपने समस्त शुभ-अशुभ कर्मों को नष्ट कर देता है (उन्हें फल देने में असमर्थ कर देता है)। जिसका अन्तःकरण प्रसन्न (शुद्ध) है, वह अपने आप में स्थित होकर शाश्वत सुख (मोक्ष) को प्राप्त करता है।॥24॥
 
Man destroys all his good and bad deeds (makes them incapable of bearing fruit) through the purity of his mind. One whose conscience is happy (pure), he, being situated in himself, attains eternal happiness (salvation).॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)