Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.213.17: जो योगीजन समस्त क्लेशों पर विजय पा चुके हैं, जो समदर्शी और धैर्यवान हैं, जिन्होंने सुषुम्ना नाड़ी द्वारा अपने प्राण को सिर (सहस्रार चक्र) में स्थापित कर लिया है, उनके लिए यही मार्ग (सिर से सिर के पैर तक सुषुम्ना) है, जिससे वे परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार ये प्राण और अनुप्राणिक श्वास सभी प्राणियों के शरीर में विद्यमान रहते हैं॥17॥ | mahabharat अध्याय 3.213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत् परम्।
जितक्लमा: समा धीरा मूर्धन्यात्मानमादधु:।
एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु॥ १७॥
अनुवाद
जो योगीजन समस्त क्लेशों पर विजय पा चुके हैं, जो समदर्शी और धैर्यवान हैं, जिन्होंने सुषुम्ना नाड़ी द्वारा अपने प्राण को सिर (सहस्रार चक्र) में स्थापित कर लिया है, उनके लिए यही मार्ग (सिर से सिर के पैर तक सुषुम्ना) है, जिससे वे परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार ये प्राण और अनुप्राणिक श्वास सभी प्राणियों के शरीर में विद्यमान रहते हैं॥17॥
For those Yogis who have conquered all the afflictions, who are equanimous and patient, who have established their vital soul in the head (Sahasrar Chakra) through the Sushumna Nadi, this is the path (Sushumna from the head to the foot of the head) by which they attain the Supreme God. In this way, these vital and non-vital breaths are present in the bodies of all living beings.॥17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥