श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.213.14 
अग्निवेगवह: प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते।
स ऊर्ध्वमागम्य पुन: समुत्क्षिपति पावकम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
गुदाद्वार से प्राण अग्नि का वेग लेकर गुदाद्वार पर प्रहार करता है; फिर वहाँ से उठकर जठराग्नि को भी ऊपर की ओर उठाता है ॥14॥
 
From the anus, the life force carries the force of fire and strikes the anus; then, rising from there, it raises the gastric fire upwards as well. ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)