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mahabharat 3.213.11: प्राण आदि वायु जब परस्पर मिलते हैं, तब संघर्ष उत्पन्न होता है। उससे जो ऊष्मा उत्पन्न होती है, उसे जठराग्नि समझना चाहिए। यही देहधारियों द्वारा खाए गए अन्न को पचाती है। ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 3.213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.213.11 
प्राणानां संनिपातात् तु संनिपात: प्रजायते।
ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
प्राण आदि वायु जब परस्पर मिलते हैं, तब संघर्ष उत्पन्न होता है। उससे जो ऊष्मा उत्पन्न होती है, उसे जठराग्नि समझना चाहिए। यही देहधारियों द्वारा खाए गए अन्न को पचाती है। ॥11॥
 
When the air like prana etc. meet each other, a conflict arises. The heat that arises from it should be considered as the gastric fire. It is this which digests the food eaten by the embodied beings. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)