श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.213.10 
धातुष्वग्निस्तु वितत: स तु वायुसमीरित:।
रसान् धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन् परिधावति॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जठराग्नि त्वचा सहित सभी धातुओं में व्याप्त है। प्राण आदि वायुओं द्वारा संचालित होकर यह सम्पूर्ण शरीर में दौड़ती है और अन्न रस, त्वचा आदि धातुओं तथा पित्त आदि दोषों को पकाती है।॥10॥
 
The gastric fire pervades all the metals, including the skin. Driven by the airs like prana, it runs throughout the body, ripening the food juices, metals like skin, and defects like bile.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)