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mahabharat 3.212.10: तत्पश्चात् राग-द्वेष आदि समस्त द्वन्द्व परस्पर शान्त हो जाते हैं और उसके हृदय में कभी कोई संशय उत्पन्न नहीं होता ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.212: तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 212: तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.212.10 
ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम्।
न चास्य संशयो नाम क्वचिद् भवति कश्चन॥ १०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् राग-द्वेष आदि समस्त द्वन्द्व परस्पर शान्त हो जाते हैं और उसके हृदय में कभी कोई संशय उत्पन्न नहीं होता ॥10॥
 
Thereafter, all the conflicts like attachment, hatred etc. are mutually calmed down. No doubt ever arises in his heart. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)