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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 211: पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.211.22 
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति।
न स पापै: कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रिय:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपने शरीर में स्थित मन सहित छहों इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेता है, वह पाप नहीं करता, फिर वह पापजन्य विपत्तियों से कैसे जुड़ सकता है?
 
The person who gains control over the six senses including the mind, which are always present in his body, does not indulge in sins. Then how can he be associated with the calamities caused by sins?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)