श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 210: विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  3.210.8-9 
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्तते रागदोषज:॥ ८॥
पापं चिन्तयते चैव ब्र्रवीति च करोति च।
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधव:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
आसक्ति के दोष के कारण वह तीन प्रकार के पाप करने लगता है- 1. वह मन में पाप का चिंतन करता है, 2. वह वाणी से पापपूर्ण बातें बोलता है और 3. वह अपने कर्मों से भी पाप करता है। इस प्रकार पापों में लिप्त होने पर उसके सभी अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं ॥8-9॥
 
Due to the defect of attachment, he starts committing three types of sins- 1. He thinks of sins in his mind, 2. He speaks sinful things with his words and 3. He also commits sins through his actions. In this way, when he gets involved in sins, all his good qualities get destroyed. ॥ 8-9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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