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श्लोक 3.210.21  |
सर्वैरिहेन्द्रियार्थैस्तु व्यक्ताव्यक्तै: सुसंवृतै:।
चतुर्विंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गुण:।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूय: श्रोतुमिच्छसि॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन-बुद्धि के व्यक्त-अव्यक्त विषयों को मिलाकर चौबीस तत्त्व होते हैं, जो बुद्धि रूपी गुफा में छिपे रहते हैं। इन तत्त्वों का समूह ही व्यक्त और अव्यक्त गुण हैं। (ये सब ब्रह्म स्वरूप हैं।) हे ब्रह्मन्! मैंने ये सब बातें तुमसे इस प्रकार कही हैं, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? |
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| There are twenty four elements when we include the five sense organs and the manifest and unmanifest objects of the mind and intellect, which remain hidden in the cave of the intellect. The group of these elements is the manifest and unmanifest qualities. (All of this is the form of Brahman.) Brahmin! I have told you all these things in this manner, what else do you want to hear? |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक
दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१०॥ |
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