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श्लोक 3.210.2  |
व्याध उवाच
विज्ञानार्थं मनुष्याणां मन: पूर्वं प्रवर्तते।
तत् प्राप्य कामं भजते क्रोधं च द्विजसत्तम॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| धर्मव्याध बोले - हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मनुष्य का मन पहले इन्द्रियों द्वारा किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करने की ओर प्रवृत्त होता है। उस विषय को प्राप्त करने पर मन में उसके प्रति राग अथवा द्वेष उत्पन्न हो जाता है॥ 2॥ |
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| Dharmavyadh said - O best of Brahmins! The mind of a person is first inclined to acquire knowledge of a subject through the senses. On acquiring that subject, the mind develops either attachment or aversion towards it.॥ 2॥ |
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