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mahabharat 3.210.14: धर्मव्याधान ने कहा- ब्रह्मन्! महाभाग ब्राह्मण और पितरों को सदैव प्रथम आहार का अधिकारी माना गया है। अतः बुद्धिमान पुरुष को इस संसार में उनसे सब प्रकार से प्रेम करना चाहिए। 14॥   |   mahabharat अध्याय 3.210: विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 210: विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.210.14 
व्याध उवाच
ब्राह्मणा वै महाभागा: पितरोऽग्रभुज: सदा।
तेषां सर्वात्मना कार्यं प्रियं लोके मनीषिणा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
धर्मव्याधान ने कहा- ब्रह्मन्! महाभाग ब्राह्मण और पितरों को सदैव प्रथम आहार का अधिकारी माना गया है। अतः बुद्धिमान पुरुष को इस संसार में उनसे सब प्रकार से प्रेम करना चाहिए। 14॥
 
Dharmavyadhan said – Brahmin! Mahabhag Brahmins and ancestors have always been considered entitled to the first food. Therefore, a wise man should love them in every way in this world. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)