श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 210: विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.210.1 
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्तस्तु विप्रेण धर्मव्याधो युधिष्ठिर।
प्रत्युवाच यथा विप्रं तच्छृणुष्व नराधिप॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी बोले - राजा युधिष्ठिर! धर्मव्याध ने जब ब्राह्मण से यह प्रश्न पूछा था, तब उसने जो उत्तर दिया था, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। सुनो।
 
Markandeyji said - King Yudhishthir! I am telling you the answer given by Dharmavyadh to the Brahmin when he asked this question. Listen.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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