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mahabharat 3.21.7-8: हे पाण्डवश्रेष्ठ! उनकी छाती, ललाट, शरीर के अन्य अंग तथा दोनों भुजाओं पर ऐसा एक भी स्थान नहीं था जो बाणों से बिंधा न हो। जैसे मेघों के बरसने पर लाल गेरू आदि धातुओं से बना पर्वत लाल जल से बहने लगता है, उसी प्रकार बाणों से बिंधे हुए उनके शरीर के अंगों से रक्त की भयंकर धारा बह रही थी।   |   mahabharat अध्याय 3.21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  3.21.7-8 
न तस्योरसि नो मूर्ध्नि न काये न भुजद्वये।
अन्तरं पाण्डवश्रेष्ठ पश्याम्यनिचितं शरै:॥ ७॥
स तु बाणवरोत्पीडाद् विस्रवत्यसृगुल्बणम्।
अभिवृष्टे यथा मेघे गिरिर्गैरिकधातुमान्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डवश्रेष्ठ! उनकी छाती, ललाट, शरीर के अन्य अंग तथा दोनों भुजाओं पर ऐसा एक भी स्थान नहीं था जो बाणों से बिंधा न हो। जैसे मेघों के बरसने पर लाल गेरू आदि धातुओं से बना पर्वत लाल जल से बहने लगता है, उसी प्रकार बाणों से बिंधे हुए उनके शरीर के अंगों से रक्त की भयंकर धारा बह रही थी।
 
O best of Pandavas! There was not a single spot on his chest, forehead, other parts of his body and both his arms that was not pierced by arrows. Just as a mountain made of red ochre and other metals starts flowing with red water when the clouds rain, similarly a terrible stream of blood was flowing from his body parts pierced by arrows. 7-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)