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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.21.6 
इति तस्य निशम्याहं सारथे: करुणं वच:।
अवेक्षमाणो यन्तारमपश्यं शरपीडितम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
सारथि के ये करुण शब्द सुनकर मैंने उसकी ओर देखा। बाणों के कारण उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी।
 
Hearing these pitiful words of the charioteer, I looked at him. He was in great pain due to the arrows.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)