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mahabharat 3.21.5: हे वीर! तब दारुक व्याकुल होकर मुझसे बोला, 'हे प्रभु! मैं युद्ध में अविचल रहने के अपने धर्म का स्मरण करते हुए यहाँ रुका हूँ; किन्तु शाल्व के बाणों से अत्यन्त घायल होने के कारण मुझमें खड़े होने की भी शक्ति नहीं बची है। मेरा शरीर दुर्बल होता जा रहा है।'   |   mahabharat अध्याय 3.21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.21.5 
ततो मामब्रवीद् वीर दारुको विह्वलन्निव।
स्थातव्यमिति तिष्ठामि शाल्वबाणप्रपीडित:।
अवस्थातुं न शक्नोमि अङ्गं मे व्यवसीदति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे वीर! तब दारुक व्याकुल होकर मुझसे बोला, 'हे प्रभु! मैं युद्ध में अविचल रहने के अपने धर्म का स्मरण करते हुए यहाँ रुका हूँ; किन्तु शाल्व के बाणों से अत्यन्त घायल होने के कारण मुझमें खड़े होने की भी शक्ति नहीं बची है। मेरा शरीर दुर्बल होता जा रहा है।'
 
O brave one! Then Daruk became restless and said to me, 'O Lord! I have stayed here remembering my duty to remain steadfast in the war; but being extremely hurt by Shalva's arrows, I have no strength left even to stand. My body is becoming weak.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)