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mahabharat 3.21.30: तब मुझे मन में निश्चय हो गया कि यह सचमुच भ्रम है। तब मैं सचेत हो गया और सैकड़ों बाणों की वर्षा करने लगा।   |   mahabharat अध्याय 3.21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.21.30 
ततो ममासीन्मनसि मायेयमिति निश्चितम्।
प्रबुद्धोऽस्मि ततो भूय: शतशोऽवाकिरं शरान्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
तब मुझे मन में निश्चय हो गया कि यह सचमुच भ्रम है। तब मैं सचेत हो गया और सैकड़ों बाणों की वर्षा करने लगा।
 
Then I became sure in my mind that this was indeed an illusion. Then I became alert and started showering hundreds of arrows. 30.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक इक्‍कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)