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mahabharat 3.21.29: वीर ! तत्पश्चात् दो घण्टे पश्चात् जब मैं सावधान होकर देखता हूँ, तो उस महायुद्ध में न तो सौभाग्य के विमान का कोई चिह्न दिखाई देता है, न मेरे शत्रु शाल्व का और न ही मेरे वृद्ध पिता का ही कोई पता चलता है।   |   mahabharat अध्याय 3.21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.21.29 
ततो मुहूर्तात् प्रतिलभ्य संज्ञा-
महं तदा वीर महाविमर्दे।
न तत्र सौभं न रिपुं च शाल्वं
पश्यामि वृद्धं पितरं न चापि॥ २९॥
 
 
अनुवाद
वीर ! तत्पश्चात् दो घण्टे पश्चात् जब मैं सावधान होकर देखता हूँ, तो उस महायुद्ध में न तो सौभाग्य के विमान का कोई चिह्न दिखाई देता है, न मेरे शत्रु शाल्व का और न ही मेरे वृद्ध पिता का ही कोई पता चलता है।
 
Braveheart! Thereafter after two hours when I become alert and look, then in that great war neither Saubhagya's plane is there any trace, nor my enemy Shalva is visible, nor is my old father visible.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)