श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.21.24 
विशीर्णमलिनोष्णीष: प्रकीर्णाम्बरमूर्धज:।
प्रपतन् दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रह:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उसकी मैली पगड़ी फटी हुई थी, वस्त्र अस्त-व्यस्त थे और बाल बिखरे हुए थे। गिरते समय वह पुण्यहीन ग्रह के समान दिख रहा था॥ 24॥
 
His dirty turban was torn, his clothes were in disarray and his hair was disheveled. While falling he looked like a planet without any virtue.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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