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श्लोक 3.21.24  |
विशीर्णमलिनोष्णीष: प्रकीर्णाम्बरमूर्धज:।
प्रपतन् दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रह:॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| उसकी मैली पगड़ी फटी हुई थी, वस्त्र अस्त-व्यस्त थे और बाल बिखरे हुए थे। गिरते समय वह पुण्यहीन ग्रह के समान दिख रहा था॥ 24॥ |
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| His dirty turban was torn, his clothes were in disarray and his hair was disheveled. While falling he looked like a planet without any virtue.॥ 24॥ |
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