श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.21.17 
अहं हि द्वारकायाश्च पितुश्च कुरुनन्दन।
तेषु रक्षां समाधाय प्रयात: सौभपातने॥ १७॥
 
 
अनुवाद
कुरुनन्दन! मैं द्वारका और अपने पिता की रक्षा का भार उन पर छोड़कर सौभविमान का विनाश करने चला गया हूँ॥17॥
 
Kurunandan! I left the responsibility of protecting Dwarka and my father on them and went to destroy Saubhaviman. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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