श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.21.16 
सात्यकिं बलदेवं च प्रद्युम्नं च महारथम्।
जगर्हे मनसा वीर तच्छ्रुत्वा महदप्रियम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वीर युधिष्ठिर! वह अत्यन्त अप्रिय कथा सुनकर मैं मन ही मन सात्यकि, बलराम और महाबली प्रद्युम्न की निन्दा करने लगा।
 
Brave Yudhishthira! On hearing that very unpleasant story, I started criticising Satyaki, Balarama and the mighty warrior Pradyumna in my mind.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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