|
| |
| |
श्लोक 3.21.10-11  |
अथ मां पुरुष: कश्चिद् द्वारकानिलयोऽब्रवीत्।
त्वरितो रथमभ्येत्य सौहृदादिव भारत॥ १०॥
आहुकस्य वचो वीर तस्यैव परिचारक:।
विषण्ण: सन्नकण्ठेन तन्निबोध युधिष्ठिर॥ ११॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे भरतवंशी वीर! उसी समय द्वारकावासी एक पुरुष आया और तुरन्त ही मेरे रथ पर चढ़ गया और मानो स्नेह प्रकट करते हुए बोला। वह राजा उग्रसेन का सेवक था और दुःखी होकर रुँधे हुए गले से उसने अपना सन्देश सुनाया, मैं तुम्हें वह बात सुनाता हूँ, सुनो॥10-11॥ |
| |
| O brave man of the Bharat dynasty! Just then a man from Dwarka came and immediately got on my chariot and spoke as if showing his cordiality. He was a servant of King Ugrasen and being sad he conveyed his message with a choked throat, I am telling you about it, listen.॥ 10-11॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|