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श्लोक 3.209.56  |
कथं च फलमाप्नोति तेषां धर्मभृतां वर।
एतदिच्छामि तत्त्वेन धर्मं ज्ञातुं निबोध मे॥ ५६॥ |
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| अनुवाद |
| हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ शिकारी! इन्द्रियों को वश में करने का फल कैसे प्राप्त होता है? मैं इन्द्रियों को वश में करने के इस धर्म का वास्तविक स्वरूप जानना चाहता हूँ। कृपया मुझे इसे समझाएँ ॥ 56॥ |
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| O best hunter among the virtuous! How does one achieve the fruit of controlling the senses? I want to know the true form of this Dharma of controlling the senses. Please explain it to me. ॥ 56॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे नवाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २०९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक दो सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०९॥
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