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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन
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श्लोक 54
श्लोक
3.209.54
इन्द्रियाणां निरोधेन सत्येन च दमेन च।
ब्रह्मण: पदमाप्नोति यत् परं द्विजसत्तम॥ ५४॥
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! इन्द्रियों का संयम, सत्य बोलना और मन का संयम - इनसे मनुष्य ब्रह्म की परम गति को प्राप्त होता है।
Dwijshreshtha! Restraint on senses, speaking truth and control of mind – through these a person attains the supreme state of Brahma.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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