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mahabharat 3.209.53-54h: तप जीवों के कल्याण का साधन है और इसका आधार शम (मन का संयम) और दम (इंद्रियों का संयम) है। मनुष्य मन से जो भी वस्तुएँ चाहता है, वह सब उसे तप के द्वारा प्राप्त हो जाती हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 53-54h
 
 
श्लोक  3.209.53-54h 
तपो नि:श्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दम:॥ ५३॥
तेन सर्वानवाप्नोति कामान् यान् मनसेच्छति।
 
 
अनुवाद
तप जीवों के कल्याण का साधन है और इसका आधार शम (मन का संयम) और दम (इंद्रियों का संयम) है। मनुष्य मन से जो भी वस्तुएँ चाहता है, वह सब उसे तप के द्वारा प्राप्त हो जाती हैं।
 
Penance is the means of welfare of the living beings and its basis is Shama (control of mind) and Dam (control of senses). Whatever things a man desires through his mind, he obtains them all through that penance. 53 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)