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mahabharat 3.209.52-53h: इस प्रकार वह त्याग को अपनाता है और पाप कर्मों का त्याग कर देता है। फिर वह पूर्णतः पुण्यात्मा बन जाता है और अन्त में परम मोक्ष को प्राप्त करता है।   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 52-53h
 
 
श्लोक  3.209.52-53h 
एवं निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च॥ ५२॥
धार्मिकश्चापि भवति मोक्षं च लभते परम्।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार वह त्याग को अपनाता है और पाप कर्मों का त्याग कर देता है। फिर वह पूर्णतः पुण्यात्मा बन जाता है और अन्त में परम मोक्ष को प्राप्त करता है।
 
In this way he adopts renunciation and gives up sinful acts. Then he becomes completely virtuous and finally attains the ultimate salvation. 52 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)