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mahabharat 3.209.49-50h: द्विजोत्तम! कुछ लोग धर्म के फलस्वरूप सांसारिक सुख पाकर भी संतुष्ट नहीं होते। ज्ञान के दर्शन के कारण, वह विषय-भोगों से संतुष्टि न पाकर निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाता है। 49 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 49-50h
 
 
श्लोक  3.209.49-50h 
धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तृप्यति महाद्विज॥ ४९॥
अतृप्यमाणो निर्वेदमापेदे ज्ञानचक्षुषा।
 
 
अनुवाद
द्विजोत्तम! कुछ लोग धर्म के फलस्वरूप सांसारिक सुख पाकर भी संतुष्ट नहीं होते। ज्ञान के दर्शन के कारण, वह विषय-भोगों से संतुष्टि न पाकर निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाता है। 49 1/2॥
 
Dwijottam! Some people are not satisfied by getting worldly happiness as a result of religion. Due to the vision of knowledge, instead of getting satisfaction from the pleasures of sensual pleasures, he attains Nirveda (dispassion). 49 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)