श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 46-47h
 
 
श्लोक  3.209.46-47h 
प्राज्ञो धर्मेण रमते धर्मं चैवोपजीवति।
तस्माद् धर्मादवाप्तेन धनेन द्विजसत्तम॥ ४६॥
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै।
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! बुद्धिमान पुरुष धर्म में सुख पाता है, धर्म का आश्रय लेकर जीवन व्यतीत करता है, धर्म से प्राप्त धन का पालन करता है, अर्थात् धर्म का पालन करता है। वह धर्म में ही सद्गुण देखता है ॥46 1/2॥
 
O best of the Brahmins! A wise man finds happiness in Dharma, takes shelter in Dharma and lives his life, nurtures the wealth obtained from Dharma, i.e., he follows Dharma. He sees virtue in Dharma. ॥ 46 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)