श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.209.45 
सन्ति ह्यागमविज्ञाना: शिष्टा: शास्त्रे विचक्षणा:।
स्वधर्मेण क्रिया लोके कर्मण: सोऽप्यसंकर:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में वेदों के विद्वान् और शास्त्रों के ज्ञाता बहुत से हैं। उनके उपदेशानुसार प्रत्येक कार्य अपने धर्मानुसार करना चाहिए। इससे कर्मों का मिश्रण नहीं होगा। ॥45॥
 
In this world there are many learned men of the Vedas and learned men with knowledge of the scriptures. As per their advice, every task must be performed while following one's own religious principles. This will prevent the mixing of karmas. ॥ 45॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas