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mahabharat 3.209.44: हे ब्रह्मन्! अतः मनुष्य को चाहिए कि वह सत्पुरुषों के धर्म का पालन करे, विनयशील मनुष्य जैसा आचरण करे और ऐसी जीविका कमाने की इच्छा रखे जिससे वह संसार के किसी प्राणी को कष्ट पहुँचाए बिना अपना जीवन निर्वाह कर सके ॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.209.44 
सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत्।
असंक्लेशेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेत वै द्विज॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! अतः मनुष्य को चाहिए कि वह सत्पुरुषों के धर्म का पालन करे, विनयशील मनुष्य जैसा आचरण करे और ऐसी जीविका कमाने की इच्छा रखे जिससे वह संसार के किसी प्राणी को कष्ट पहुँचाए बिना अपना जीवन निर्वाह कर सके ॥ 44॥
 
O Brahman! Therefore, a man should follow the religion of the good men, behave like a courteous man and aspire to earn a livelihood in which he can sustain his life without causing pain to any creature in the world. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)