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mahabharat 3.209.42: पुण्यात्मा पुरुष दोषरहित और कृतज्ञ होकर कल्याणकारी कर्मों में प्रवृत्त होता है और सुख, धर्म, धन और स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥42॥   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.209.42 
अनसूयु: कृतज्ञश्च कल्याणानि च सेवते।
सुखानि धर्ममर्थं च स्वर्गं च लभते नर:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
पुण्यात्मा पुरुष दोषरहित और कृतज्ञ होकर कल्याणकारी कर्मों में प्रवृत्त होता है और सुख, धर्म, धन और स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥42॥
 
A virtuous person, free from blame and grateful, indulges in beneficial deeds and attains happiness, religion, wealth and heaven. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)