vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन
»
श्लोक 42
श्लोक
3.209.42
अनसूयु: कृतज्ञश्च कल्याणानि च सेवते।
सुखानि धर्ममर्थं च स्वर्गं च लभते नर:॥ ४२॥
अनुवाद
पुण्यात्मा पुरुष दोषरहित और कृतज्ञ होकर कल्याणकारी कर्मों में प्रवृत्त होता है और सुख, धर्म, धन और स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥42॥
A virtuous person, free from blame and grateful, indulges in beneficial deeds and attains happiness, religion, wealth and heaven. 42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×