Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.209.41: पाप करने वाला मनुष्य पाप का आदी हो जाता है और फिर उसके पापों का अन्त नहीं होता। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह केवल पुण्य कर्म करने का प्रयत्न करे और पापों का सर्वथा त्याग कर दे ॥41॥   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.209.41 
पापं कुर्वन् पापवृत्त: पापस्यान्तं न गच्छति।
तस्मात् पुण्यं यतेत् कर्तुं वर्जयीत च पापकम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
पाप करने वाला मनुष्य पाप का आदी हो जाता है और फिर उसके पापों का अन्त नहीं होता। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह केवल पुण्य कर्म करने का प्रयत्न करे और पापों का सर्वथा त्याग कर दे ॥41॥
 
A person who commits sins gets used to it and then there is no end to his sins. Therefore, a person should try to do only pious deeds and give up sins completely. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)