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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन
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श्लोक 40
श्लोक
3.209.40
स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभि:।
प्राप्नोति सुकृताँल्लोकान् यत्र गत्वा न शोचति॥ ४०॥
अनुवाद
इस प्रकार बन्धन से मुक्त और पवित्र हुआ मनुष्य अपने पुण्यकर्मों के प्रभाव से पवित्र लोक को प्राप्त होता है, जहाँ कोई शोक नहीं करता ॥40॥
A man thus freed from bondage and purified, by the effect of his pious deeds, attains the holy world, where no one grieves. ॥ 40॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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