श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.209.35 
जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तै: स्वकृतै: प्रेत्य दु:खित:।
तद्दु:खप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्नुते॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
प्रत्येक जीव मृत्यु के बाद अपने कर्मों के कारण दुःख भोगता है और उस दुःख को भोगने के लिए वह पाप योनि (चांडाल जैसी) में जन्म लेता है।
 
Every living being suffers due to its own deeds after death and to endure that suffering, it takes birth in a sinful form (like a Chandala).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)