vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन
»
श्लोक 35
श्लोक
3.209.35
जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तै: स्वकृतै: प्रेत्य दु:खित:।
तद्दु:खप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्नुते॥ ३५॥
अनुवाद
प्रत्येक जीव मृत्यु के बाद अपने कर्मों के कारण दुःख भोगता है और उस दुःख को भोगने के लिए वह पाप योनि (चांडाल जैसी) में जन्म लेता है।
Every living being suffers due to its own deeds after death and to endure that suffering, it takes birth in a sinful form (like a Chandala).
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×