श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.209.34 
तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च।
जीवा: सम्परिवर्तन्ते कर्मबन्धनिबन्धना:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
कर्म के बंधन में बँधे हुए (पापी) जीव हजारों प्रकार की योनियों और नरकों में घूमते रहते हैं ॥34॥
 
The (sinful) souls bound in the bondage of karma roam around in thousands of different types of births and hells. 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)