Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.209.33: मनुष्य अपने ही पापों के कारण जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के दुःखों से त्रस्त होकर इस संसार में बार-बार दुःख पाता है ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.209.33 
जातिमृत्युजरादु:खै: सततं समभिद्रुत:।
संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नर:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य अपने ही पापों के कारण जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के दुःखों से त्रस्त होकर इस संसार में बार-बार दुःख पाता है ॥33॥
 
Man, due to his own sins, is tormented by the sorrows of birth, death and old age and is repeatedly tormented in this world. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)