श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  3.209.18-19h 
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम्॥ १८॥
स्रोतसासकृदाक्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार यह जगत् मोह और दुःख में डूबा हुआ असहाय है। कर्मों के अत्यन्त प्रबल प्रवाह में पड़कर यह बार-बार रोगों और व्याधियों की लहरों का आघात सहता है और असहाय होकर इधर-उधर बहता रहता है।॥18 1/2॥
 
In this way this world is helpless and drowned in delusion and sorrow. Falling into the very strong flow of karmas, it repeatedly bears the brunt of its waves of diseases and illnesses and is helplessly swept here and there.॥ 18 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)