Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.209.15-16h: हे ब्रह्मन्! (उनका भोग समाप्त हो जाने पर) औषधियों का संग्रह करने वाला चतुर वैद्य उन रोगों को उसी प्रकार दूर कर देता है, जैसे शिकारी मृगों को भगा देता है।   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  3.209.15-16h 
ते चापि कुशलैर्वैद्यैर्निपुणै: सम्भृतौषधै:॥ १५॥
व्याधयो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज।
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! (उनका भोग समाप्त हो जाने पर) औषधियों का संग्रह करने वाला चतुर वैद्य उन रोगों को उसी प्रकार दूर कर देता है, जैसे शिकारी मृगों को भगा देता है।
 
O Brahman! (After their consumption is over) a clever physician who has collected medicines cures those diseases in the same way as a hunter drives away deer. 15 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)