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mahabharat 3.209.10-11h: और दूसरा मनुष्य, जो सदैव जीवों को हानि पहुंचाने में तत्पर रहता है तथा लोगों को धोखा देने में लगा रहता है, वह सुखी जीवन व्यतीत करता हुआ देखा जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 209: धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  3.209.10-11h 
भूतानामपर: कश्चिद्धिंसायां सततोत्थित:॥ १०॥
वञ्चनायां च लोकस्य स सुखी जीवते सदा।
 
 
अनुवाद
और दूसरा मनुष्य, जो सदैव जीवों को हानि पहुंचाने में तत्पर रहता है तथा लोगों को धोखा देने में लगा रहता है, वह सुखी जीवन व्यतीत करता हुआ देखा जाता है।
 
And the other man, who is always ready to harm living beings and is always engaged in deceiving people, is seen living a happy life. 10 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)