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mahabharat 3.208.9: ‘ब्रह्म! जो मनुष्य अपने कर्तव्य का परित्याग करता है, वह यहाँ पापकर्म करता हुआ देखा जाता है। यह सिद्धान्त है कि जो अपने कर्तव्य में तत्पर रहता है, उसका आचरण ही धर्ममय होता है।॥9॥   |   mahabharat अध्याय 3.208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.208.9 
स्वकर्म त्यजतो ब्रह्मन्नधर्म इह दृश्यते।
स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्म: स इति निश्चय:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
‘ब्रह्म! जो मनुष्य अपने कर्तव्य का परित्याग करता है, वह यहाँ पापकर्म करता हुआ देखा जाता है। यह सिद्धान्त है कि जो अपने कर्तव्य में तत्पर रहता है, उसका आचरण ही धर्ममय होता है।॥9॥
 
‘Brahman! One who abandons his duty is seen to be committing sinful actions here. It is a principle that only one who is devoted to his duty, his conduct is righteous.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)