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mahabharat 3.208.4-5: 'द्विजश्रेष्ठ! हम तो इस कार्य में निमित्त मात्र हैं। हे ब्रह्मन्! मैं जिन पशुओं को मारता हूँ, उनके जीवित रहते हुए उनके मांस का सदुपयोग किया जाता, तो यह महान धर्म होता। मांसाहार में कोई धर्म नहीं है (प्रत्युत यह तो महान अन्याय है)। देवताओं, अतिथियों, कुटुम्बियों और पितरों का पूजन अवश्य ही धर्म है। 4-5॥   |   mahabharat अध्याय 3.208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  3.208.4-5 
निमित्तभूता हि वयं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम।
येषां हतानां मांसानि विक्रीणामीह वै द्विज॥ ४॥
तेषामपि भवेद् धर्म उपयोगे न भक्षणे।
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चापि पूजनम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'द्विजश्रेष्ठ! हम तो इस कार्य में निमित्त मात्र हैं। हे ब्रह्मन्! मैं जिन पशुओं को मारता हूँ, उनके जीवित रहते हुए उनके मांस का सदुपयोग किया जाता, तो यह महान धर्म होता। मांसाहार में कोई धर्म नहीं है (प्रत्युत यह तो महान अन्याय है)। देवताओं, अतिथियों, कुटुम्बियों और पितरों का पूजन अवश्य ही धर्म है। 4-5॥
 
‘Dwijashrestha! We are just instruments in this work. Brahman! It would have been a great religion if the meat of the killed animals that I sell was put to good use while they were alive. There is no religion in eating meat (on the contrary, it is a great injustice). Worship of gods, guests, family members and ancestors is definitely religion. 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)