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mahabharat 3.208.29: धर्म और अधर्म से संबंधित कर्मों के विषय में और भी बहुत सी बातें कही जा सकती हैं। अतः जो अपने कुल के अनुकूल कर्म में लगा रहता है, वही महान यश प्राप्त करता है।॥29॥   |   mahabharat अध्याय 3.208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.208.29 
वक्तुं बहुविधं शक्यं धर्माधर्मेषु कर्मसु।
स्वकर्मनिरतो यो हि स यश: प्राप्नुयान्महत्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
धर्म और अधर्म से संबंधित कर्मों के विषय में और भी बहुत सी बातें कही जा सकती हैं। अतः जो अपने कुल के अनुकूल कर्म में लगा रहता है, वही महान यश प्राप्त करता है।॥29॥
 
‘Many more things can be said about the actions related to Dharma and Adharma. Therefore, the one who is engaged in the work befitting his family, he himself gets great fame.'॥ 29॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने ब्राह्मणव्याधसंवादे अष्टाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २०८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानके प्रसंगमें ब्राह्मणव्याध-संवादविषयक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)