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mahabharat 3.208.20: चलते समय मनुष्य अनजाने में ही अपने पैरों से पृथ्वी पर रहने वाले बहुत से प्राणियों को मार डालते हैं। हे ब्रह्मन्! तुम उनके विषय में क्या सोचते हो?॥ 20॥   |   mahabharat अध्याय 3.208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.208.20 
चङ्‍‍क्रम्यमाणा जीवांश्च धरणीसंश्रितान् बहून्।
पद्भॺां घ्नन्ति नरा विप्र तत्र किं प्रतिभाति ते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
चलते समय मनुष्य अनजाने में ही अपने पैरों से पृथ्वी पर रहने वाले बहुत से प्राणियों को मार डालते हैं। हे ब्रह्मन्! तुम उनके विषय में क्या सोचते हो?॥ 20॥
 
‘While walking, human beings (inadvertently) kill many living creatures on earth with their feet. O Brahman! What do you think about them?॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)