Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.208.12-13: ऐसा बार-बार करने से उस घोर कर्म से छूटने का निश्चित उपाय प्राप्त होता है। द्विजश्रेष्ठ! मैं दान में सदैव तत्पर रहकर, सत्य बोलकर, गुरु की सेवा करके, ब्राह्मणों का पूजन करके तथा धर्म का पालन करके अभिमान और अतिवाद से दूर रहता हूँ। 12-13॥ | mahabharat अध्याय 3.208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
कर्मणस्तस्य घोरस्य बहुधा निर्णयो भवेत्।
दाने च सत्यवाक्ये च गुरुशुश्रूषणे तथा॥ १२॥
द्विजातिपूजने चाहं धर्मे च निरत: सदा।
अभिमानातिवादाभ्यां निवृत्तोऽस्मि द्विजोत्तम॥ १३॥
अनुवाद
ऐसा बार-बार करने से उस घोर कर्म से छूटने का निश्चित उपाय प्राप्त होता है। द्विजश्रेष्ठ! मैं दान में सदैव तत्पर रहकर, सत्य बोलकर, गुरु की सेवा करके, ब्राह्मणों का पूजन करके तथा धर्म का पालन करके अभिमान और अतिवाद से दूर रहता हूँ। 12-13॥
By doing this again and again, a definite solution is obtained to get rid of that terrible karma. Dwijshreshtha! I stay away from pride and extremism by always being ready for charity, speaking truth, serving Guru, worshiping Brahmins and following religion. 12-13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥