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mahabharat 3.208.10: ‘पूर्व में किये हुए कर्म देहधारी मनुष्य को नहीं छोड़ते। प्रायः कर्मों का निर्णय करते समय विधाता ने यही विधि उसके सामने रखी है।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 208: धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.208.10 
पूर्वं हि विहितं कर्म देहिनं न विमुञ्चति।
धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मनिर्णये॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘पूर्व में किये हुए कर्म देहधारी मनुष्य को नहीं छोड़ते। प्रायः कर्मों का निर्णय करते समय विधाता ने यही विधि उसके सामने रखी है।॥10॥
 
‘The deeds done in the past do not leave the embodied human being. Often, while deciding the deeds, the Creator has kept this method in front of him.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)