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mahabharat 3.207.d1h-39h: हे पुरुषश्रेष्ठ! राजा जनक अपनी धर्मपरायण समस्त प्रजा पर सदैव दया करते हैं और पिता के समान उनका पालन-पोषण करते हैं। जो मेरी स्तुति करते हैं और जो मेरी निन्दा करते हैं, उन सबको मैं अपने उत्तम आचरण से संतुष्ट रखता हूँ।॥38॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक d1h-39h
 
 
श्लोक  3.207.d1h-39h 
अनुगृह्णन् प्रजा: सर्वा स्वधर्मनिरता: सदा।
(पात्येव राजा जनक: पितृवज्जनसत्तम।)
ये चैव मां प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवा:॥ ३८॥
सर्वान् सुपरिणीतेन कर्मणा तोषयाम्यहम्।
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! राजा जनक अपनी धर्मपरायण समस्त प्रजा पर सदैव दया करते हैं और पिता के समान उनका पालन-पोषण करते हैं। जो मेरी स्तुति करते हैं और जो मेरी निन्दा करते हैं, उन सबको मैं अपने उत्तम आचरण से संतुष्ट रखता हूँ।॥38॥
 
O best of men! King Janaka always shows his kindness to all his subjects who are devoted to their religion and always takes care of them like a father. Those who praise me and those who criticize me, I keep them all satisfied with my good behavior. ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)