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mahabharat 3.207.96-97h: दोष का अभाव, क्षमा, शांति, संतोष, प्रिय वचन, काम और क्रोध का त्याग, सदाचार का पालन और शास्त्रविधि के अनुसार कर्म करना - यह महापुरुषों का सर्वोत्तम मार्ग है ॥96 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 96-97h
 
 
श्लोक  3.207.96-97h 
अनसूया क्षमा शान्ति: संतोष: प्रियवादिता।
कामक्रोधपरित्याग: शिष्टाचारनिषेवणम्॥ ९६॥
कर्म च श्रुतसम्पन्नं सतां मार्गमनुत्तमम्।
 
 
अनुवाद
दोष का अभाव, क्षमा, शांति, संतोष, प्रिय वचन, काम और क्रोध का त्याग, सदाचार का पालन और शास्त्रविधि के अनुसार कर्म करना - यह महापुरुषों का सर्वोत्तम मार्ग है ॥96 1/2॥
 
Absence of blame, forgiveness, peace, contentment, loving words and renunciation of lust and anger, maintaining good manners and performing actions in accordance with the scriptures – this is the best path for great men. 96 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)