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mahabharat 3.207.94-95: जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदय में दया है, वे महापुरुष इस लोक में परम संतुष्ट रहते हैं और धर्म के उत्तम मार्ग का अनुसरण करते हैं। जो धर्म का पालन करने का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, वे ही महात्मा और पुण्यात्मा हैं ॥94-95॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 94-95
 
 
श्लोक  3.207.94-95 
सर्वत्र च दयावन्त: सन्त: करुणवेदिन:॥ ९४॥
गच्छन्तीह सुसंतुष्टा धर्मपन्थानमुत्तमम्।
शिष्टाचारा महात्मानो येषां धर्म: सुनिश्चित:॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदय में दया है, वे महापुरुष इस लोक में परम संतुष्ट रहते हैं और धर्म के उत्तम मार्ग का अनुसरण करते हैं। जो धर्म का पालन करने का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, वे ही महात्मा और पुण्यात्मा हैं ॥94-95॥
 
Those who show kindness everywhere, who have compassion in their hearts, those great men remain very satisfied in this world and follow the best path of religion. Those who have firmly resolved to follow the religion, they are the great souls and virtuous. ॥94-95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)